पाकुड़ : आमरापाड़ा में विस्थापितों का आर-पार का संग्राम, पचुवाड़ा कोयला खदानों पर तालाबंदी की चेतावनी
पाकुड़ : झारखंड के पाकुड़ जिले के आमरापाड़ा प्रखंड में पचुवाड़ा मध्य और उत्तर कोयला खदानों के खिलाफ विस्थापितों का आक्रोश बढ़ता जा रहा है। ‘पचुवाड़ा कोयला खदान विस्थापित मोर्चा’ के बैनर तले प्रभावित रैयत और आदिवासी 5 जून से जिला समाहरणालय के समक्ष अनिश्चितकालीन धरने पर बैठे हैं। विस्थापितों ने प्रशासन और खनन कंपनियों को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा है कि यदि उनकी मांगें जल्द पूरी नहीं हुईं, तो कोयला उत्खनन और ट्रांसपोर्टिंग का कार्य पूरी तरह ठप कर दिया जाएगा।
क्या है पूरा मामला?
आंदोलनकारियों का आरोप है कि पंजाब (PSPCL) और पश्चिम बंगाल (WBPDCL) की सरकारी कंपनियों द्वारा बिना विधिवत भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया पूरी किए ही निजी जमीनों पर अवैध खनन और ब्लास्टिंग की जा रही है।
मुन्नी हांसदा ने आरटीआई (RTI) दस्तावेजों का हवाला देते हुए दावा किया कि कठालडीह, चिलगो और बीसनपुर जैसे क्षेत्रों में रैयतों के साथ घोर अन्याय हो रहा है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि वर्ष 2025 से बारूद मैगजीन का लाइसेंस अवैध होने के बावजूद कंपनी द्वारा भारी ब्लास्टिंग की जा रही है, जिससे आदिवासियों की जमीनें बर्बाद हो रही हैं।
विस्थापितों की प्रमुख मांगें:
आंदोलन का नेतृत्व कर रहे मोहन मुर्मू, मुन्नी हांसदा और मेरीलीना सोरेन ने जिला प्रशासन को सौंपे पत्र में निम्नलिखित मांगें रखी हैं:
उचित मुआवजा: केंद्रीय कानून के प्रावधानों के अनुरूप भूमि का चार गुना मुआवजा दिया जाए।
रोजगार या एकमुश्त राशि: प्रभावित परिवारों को सरकारी रोल पर नौकरी दी जाए, अन्यथा 1.20 करोड़ रुपये की एकमुश्त राशि का भुगतान हो।
स्थानीय प्राथमिकता: स्थानीय स्तर पर उप-ठेकेदारी (Sub-contracting) में 10 से 15 प्रतिशत काम में प्राथमिकता दी जाए।
डीएमएफटी फंड का उपयोग: जिले के डीएमएफटी (DMFT) फंड का 90% हिस्सा प्रभावित क्षेत्रों में शिक्षा और बुनियादी विकास कार्यों पर खर्च किया जाए।
नियमों का अनुपालन: हाईपावर कमेटी के प्रावधानों और एमओडी (MoD) के नियमों के अनुसार विस्थापितों को सुविधाएं मिलें।
धरने पर बैठे विस्थापितों का कहना है कि वे अपने जल-जंगल-जमीन की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं। उन्होंने जिला प्रशासन पर राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के आदेशों की अनदेखी करने का आरोप लगाया है। नेताओं ने स्पष्ट किया है कि यदि सरकार ने जल्द ठोस कदम नहीं उठाए, तो शांतिपूर्ण आंदोलन उग्र रूप धारण कर लेगा और ग्रामीण स्वयं कंपनियों को खदेड़ने पर मजबूर होंगे।
स्थानीय दलालों पर भी आरोप लग रहे हैं कि वे आदिवासियों को मामूली प्रलोभन देकर उनकी जमीनों से बेदखल करने की साजिश रच रहे हैं।
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