रांची: मांडर में 115 करोड़ के जमीन घोटाले का भंडाफोड़, 14.34 एकड़ जमीन को बिना रजिस्ट्री किया मोटेशन

रांची: झारखंड की राजधानी रांची में जमीन माफिया और सरकारी अमले की मिलीभगत से चल रहा जमीन घोटाला थमने का नाम नहीं ले रहा है। ताजा मामला मांडर अंचल से सामने आया है, जहां बेशकीमती गैर मजरुआ खास जमीन को निजी भूमि बनाकर बंदरबांट करने का बड़ा खेल पकड़ा गया है। इस मामले में मांडर अंचल की सीओ चंचला कुमारी ने राजस्व कर्मचारी पुना उरांव के खिलाफ मांडर थाना में प्राथमिकी दर्ज कराई है।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!क्या है पूरा मामला?
मांडर अंचल के मौजा हेसमी में रांची-लोहरदगा एनएच पर टोल प्लाजा के पास स्थित 14.34 एकड़ जमीन को निशाना बनाया गया। यह पूरी जमीन ‘गैर मजरुआ’ किस्म की है, जिसका बाजार मूल्य लगभग 8 लाख रुपये प्रति डिसमिल है। इस हिसाब से इस 115 करोड़ रुपये की सरकारी संपत्ति को फर्जीवाड़ा कर निजी हाथों में सौंपने की कोशिश की गई।
कैसे हुआ करोड़ों का ‘खेल’?
जांच में खुलासा हुआ कि राजस्व कर्मचारी पुना उरांव ने अपने रिटायरमेंट से महज 4 महीने पहले इस साजिश को अंजाम दिया।
दस्तावेजों में हेरफेर: आरोपी कर्मचारी ने ऑफलाइन और ऑनलाइन ‘पंजी-2’ (Register-2) में सुनियोजित तरीके से छेड़छाड़ की।
अवैध म्यूटेशन: बिना किसी उच्च अधिकारी (सीआई या सीओ) की अनुमति के, इस जमीन का म्यूटेशन नारायण मिस्त्री, पिता नंदलाल मिस्त्री के नाम पर कर दिया गया
गैरमजरूआ जमीन को रैयती बनाना: कागजों में हेरफेर कर ‘परती कदीम’ और ‘गैर मजरुआ’ जमीन को ‘रैयती’ बना दिया गया ताकि इसे बेचना आसान हो सके।
8 महीने में बदली गई तीन बार जमाबंदी
एसआईटी (SIT) को सौंपी गई रिपोर्ट और दस्तावेजों से पता चलता है कि पिछले 8 महीनों के भीतर इस जमीन की जमाबंदी के साथ बार-बार छेड़छाड़ की गई। मूल पंजी के अनुसार, पहले यह लुकस उरांव के नाम पर थी, जिसे पेन से काटकर राजेश जेराल्ड एक्का का नाम जोड़ा गया। अब वर्तमान में इसे नारायण मिस्त्री, बलदेव प्रसाद शर्मा और रामेश्वर राम दुबे के नाम पर दर्ज कर दिया गया है।
प्रशासन की लापरवाही और फाइलें दबने का आरोप
यह घोटाला रातों-रात नहीं हुआ, बल्कि प्रशासनिक अनदेखी के कारण फला-फूला:
2022 में भी उठी थी आवाज: मांडर के तत्कालीन सीओ ने 31 मार्च 2022 को डीसीएलआर को पत्र लिखकर बिहार भूमि सुधार अधिनियम, 1950 की धारा 4 (एच) के तहत कार्रवाई की मांग की थी, ताकि फर्जी हस्तांतरण को रद्द किया जा सके।
कार्रवाई की जगह चुप्पी: हैरानी की बात है कि 4 साल बीत जाने के बाद भी किसी अधिकारी ने इस पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की, जिसका फायदा उठाते हुए माफिया ने जमीन पर कंटीले तार से घेराबंदी तक कर ली।
आरोपी कर्मचारी का बचाव, लेकिन साक्ष्य खिलाफ
जब सीओ चंचला कुमारी ने मामले की गंभीरता को देखते हुए राजस्व उप निरीक्षक पुना उरांव से जवाब मांगा, तो उन्होंने अपनी भूमिका से साफ इनकार कर दिया। हालांकि, सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार 22 दिसंबर 2025 को राजस्व उप निरीक्षक सदानंद ने उक्त हलका का प्रभार पुना उरांव को सौंपा था। रिकॉर्ड और हस्ताक्षरों के मिलान से पुना उरांव की संलिप्तता स्पष्ट रूप से उजागर हो रही है।
सीओ द्वारा दर्ज कराई गई प्राथमिकी के बाद पुलिस अब इस पूरे रैकेट की जांच कर रही है। सीआईडी की एसआईटी भी इस मामले के तमाम पहलुओं को खंगाल रही है, क्योंकि यह जमीन पहले से ही जांच के दायरे में थी। स्थानीय लोगों में इस खुलासे के बाद भारी आक्रोश है और मामले में बड़े सफेदपोशों की संलिप्तता की भी आशंका जताई जा रही है।
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