IRS Nisha Oraon, Missionary School Controversy,

धार्मिक प्रार्थना विवाद: ‘नैरेटिव भटक गया है’ – IRS निशा उरांव का मसीह समाज से तीखा सवाल, छेड़ी संविधान पर नई बहस

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IRS Nisha Oraon, Missionary School Controversy,

रांची: मिशनरी स्कूलों में प्रार्थना और धार्मिक मंत्रोच्चार को लेकर चल रहे विवाद में अब IRS अधिकारी निशा उरांव ने एक बार फिर अपनी बात रखी है। उन्होंने डीएसपी किशोर रजक के पिछले संवैधानिक स्पष्टीकरण के जवाब में एक विस्तृत पोस्ट लिखकर बहस का रुख फिर से ‘दोहरे मापदंड’ बनाम ‘समान धर्मनिरपेक्षता’ की ओर मोड़ दिया है।

निशा उरांव का पलटवार: “मुद्दा क्या था और क्या बन गया?

निशा उरांव ने कटाक्ष करते हुए लिखा, *”देख रहे हो विनोद, नैरेटिव भटक गया है।”* उन्होंने अपने ताजा स्टैंड में स्पष्ट किया कि विवाद इस बात पर नहीं है कि ईसाई स्कूलों में सनातनी मंत्र क्यों नहीं पढ़ाए जाते, बल्कि यह है कि छत्तीसगढ़ का मसीह समाज सनातनी मंत्र पर आपत्ति क्यों कर रहा है?

संवैधानिक तर्कों का सहारा

निशा उरांव ने संविधान के अनुच्छेदों के माध्यम से अपना पक्ष मजबूत किया है:

अनुच्छेद 28(1): यदि किसी अल्पसंख्यक स्कूल को 100% सरकारी फंड मिलता है, तो वहां किसी भी प्रकार की धार्मिक शिक्षा या प्रार्थना का आयोजन वर्जित है।

अनुच्छेद 28(3): आंशिक सहायता प्राप्त स्कूलों में छात्रों को धार्मिक प्रार्थना के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। यदि छात्र नाबालिग है, तो अभिभावकों की सहमति अनिवार्य है।

अनुभव साझा किया: निशा उरांव ने बताया कि वे स्वयं मिशनरी स्कूल में पढ़ी हैं। उनके परिवार या अन्य सनातनी अभिभावकों से कभी ईसाई प्रार्थना के लिए अनुमति नहीं मांगी गई थी, लेकिन उन्होंने कभी इस पर आपत्ति नहीं की। उन्होंने इसे ही ‘सच्ची धर्मनिरपेक्षता’ बताया।

धर्मनिरपेक्षता सिर्फ एक पक्ष की जिम्मेदारी क्यों?

निशा उरांव ने इस बहस के जरिए कई गंभीर सवाल उठाए हैं:

1. दोहरा मापदंड: जब सनातनी परिवारों ने सालों से ईसाई प्रार्थनाओं को बिना आपत्ति के स्वीकार किया, तो मसीह समाज अब सनातनी मंत्र पर आपत्ति क्यों जता रहा है?

2. सांप्रदायिकता का ठप्पा: उन्होंने पूछा कि जब गैर-अल्पसंख्यक वर्ग अनुच्छेद 25 के तहत अपने धर्म के संरक्षण की बात करते हैं, तो उन्हें ‘असहिष्णु’ या ‘सांप्रदायिक’ क्यों कह दिया जाता है?

3. समान अधिकार: उनके अनुसार, धर्मनिरपेक्षता सभी धर्मों और वर्गों की समान जिम्मेदारी है। संवैधानिक अधिकार सबके लिए एक समान हैं।

मसीह समाज से अपील

निशा उरांव ने अपनी पोस्ट के अंत में छत्तीसगढ़ के मसीह समाज से आग्रह किया है कि वे अपनी आपत्ति पर पुनः विचार करें। उन्होंने तर्क दिया कि ईसाई प्रभु की स्तुति करने से जिस तरह सनातनी-सरना बच्चों की आस्था को कोई खतरा महसूस नहीं हुआ, उसी प्रकार अब मसीह समाज को भी उदारता दिखानी चाहिए।

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