झारखंड का पर्यावरण: एक ओर राखोहरि महतो का ‘तपोवन’, तो दूसरी ओर दम तोड़ती जमुनिया नदी
रांची/धनबाद: झारखंड की फिजाओं में इन दिनों पर्यावरण को लेकर दो विपरीत स्वर सुनाई दे रहे हैं। एक तरफ राखोहरि महतो जैसे ‘वृक्ष-मित्र’ हैं जिन्होंने बंजर जमीन को जीवन से भर दिया है, तो दूसरी तरफ धनबाद की जमुनिया नदी है जो माफियाओं और प्रशासनिक उपेक्षा के कारण अपनी अंतिम सांसें गिन रही है। यह लेख झारखंड की उसी पर्यावरणीय त्रासदी और उम्मीद की साझा तस्वीर को बयां करता है।
राखोहरि महतो: जहाँ व्यक्तिगत संकल्प ने लिखा इतिहास
रांची जिले के राहे प्रखंड स्थित कदमडीह गांव में राखोहरि महतो ने पिछले 35 वर्षों से एक ‘मूक तपस्या’ की है। 1991 में जब उन्होंने अपनी चार एकड़ पैतृक भूमि पर पहला पौधा लगाया था, तब किसी ने नहीं सोचा था कि यह तीन दशक बाद एक घने जंगल में तब्दील हो जाएगा।
उनकी मेहनत के अनछुए पहलू:
विविधता का संगम: राखोहरि के इस ‘निजी जंगल’ में साल, कुसुम, नीम, बरगद, गम्हार, जामुन, आम, करम, डुमर, पाकड़, पलाश, शीशम और बेर जैसी सैकड़ों प्रजातियां फल-फूल रही हैं।
स्व-वित्तपोषित मॉडल: उन्होंने यह सारा कार्य बिना किसी सरकारी अनुदान या सरकारी नर्सरी की मदद के किया है। उनकी यह उपलब्धि इस बात का प्रमाण है कि यदि इच्छाशक्ति मजबूत हो, तो ‘विकास’ और ‘पर्यावरण’ के बीच संतुलन बनाया जा सकता है।
पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण: आज यह जगह पक्षियों, कीटों और छोटे वन्यजीवों का एक सुरक्षित ठिकाना बन चुकी है। राखोहरि के लिए पेड़ लगाना केवल वृक्षारोपण नहीं, बल्कि एक ‘धर्म’ है।
2. जमुनिया नदी: कोयलांचल की जीवनरेखा पर मंडराता ‘मौत का साया’
जहाँ एक ओर राखोहरि महतो प्रकृति को सींच रहे हैं, वहीं धनबाद के बाघमारा में जमुनिया नदी को व्यवस्थित तरीके से ‘खत्म’ किया जा रहा है। कभी कल-कल बहने वाली यह नदी आज कोयलांचल के प्रदूषण और अवैध उत्खनन की भेंट चढ़ चुकी है।
संकट की भयावह तस्वीर:
अवैध माइंस का मकड़जाल: कोयला माफियाओं ने नदी की धारा को जगह-जगह मिट्टी और पत्थरों के बांध बनाकर रोक दिया है। इसके सीने में अवैध सुरंगें खोदी जा रही हैं, जिससे नदी का जल प्रवाह बाधित हो गया है।
जलापूर्ति पर खतरा: यह नदी केवल पानी का स्रोत नहीं है, बल्कि कतरास जलापूर्ति योजना और बीसीसीएल की कई कॉलोनियों की जीवनरेखा है। नदी के सूखने का अर्थ है लाखों लोगों का पेयजल संकट में पड़ना।
प्रशासनिक खामोशी: वन एवं पर्यावरण विभाग की चुप्पी ने अवैध बालू माफिया और कोयला तस्करों के हौसले बुलंद कर दिए हैं। नदी धीरे-धीरे एक ‘गंदे नाले’ में तब्दील हो रही है।
झारखंड के इन दो छोरों के बीच एक बड़ा संदेश छिपा है। राखोहरि महतो यह साबित करते हैं कि प्रकृति संरक्षण के लिए बहुत बड़े बजट की नहीं, बल्कि एक प्रतिबद्ध मन की जरूरत होती है। वहीं, जमुनिया नदी का हाल यह चेतावनी है कि यदि हम अपनी नदियों के प्रति संवेदनशील नहीं हुए, तो आने वाले समय में पानी के लिए हमें बहुत बड़ी कीमत चुकानी होगी।
समय आ गया है कि प्रशासन को धनबाद की जमुनिया नदी के लिए तुरंत ‘पुनरुद्धार अभियान’ शुरू करना चाहिए और राखोहरि महतो जैसे पर्यावरण प्रहरियों को प्रोत्साहित करना चाहिए ताकि वे समाज के लिए प्रेरणा के स्रोत बने रहें।
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